जीवन की कश्ती

जीवन की कश्ती
लहरे पल पल
समय का सागर
बहता कलकल

रौद्र ये कभी तो
कभी उत्छृंखल
गहरा कही तो
कही ये समतल

किसको पता ये
कब लेगा निगल
चारों ओर फैला
रंग बदलता जल

तय कर दिशा
अपना जीवन सकल
लहरोंसे जूझें कोई
हो ना हो सफल

किस्मत पे भरोसा
किसी का अटल
लहरों के हवाले
बहता रहे अविचल

दूर कहीं छुपी है
जन्नतसी धरातल
तलाश में उसकी
पडे है कुछ निकल

कौन सही कौन गलत
बाते ये अनर्गल
हर एक की नजर मे
हैं दूसरा पागल

मौजसे लो मौज
डर को करो तुम बेदखल
वोही करो हरदम
दिल जाए जिसमें बहल


२९-०६-२०१९

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